Lahar

मै और मेरी तन्हाई .....

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एक गुमनाम ख़त

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आज फिर तुम्हें खत लिखने बैठा हूं,
पुरानी यादों को फिर से संजोने बैठा हूं।


साथ बिताए, हर लम्हें को,
फिर से महसूस करने बैठा हूं।


तुम्हारी यादों के अतीत में,
फिर से जाने को बैठा हूं।

handwritten-letter

आज फिर तुम्हें खत लिखने बैठा हूं।


पहली मुलाकात से लेकर अबतक,
की हर बात को लिखने बैठा हूं।


प्यार – मुहब्बत, लड़ाई – झगड़े,
हर अहसास को लिखने बैठा हूं।

आज फिर तुम्हे खत लिखने बैठा हूं।


आना – जाना, मिलना – बिछुड़ना,

हर पल को फिर से जीने बैठा हूं।

तेरे यादों के काफिले को,
फिर से रोकने बैठा हूं।


आज फिर तुम्हें खत लिखने बैठा हूं।
साथ बिताएं हर अदभुत पल को,


फिर से दोहराने बैठा हूं।
बड़े दिनों के बाद,


आज फिर तुम्हें खत लिखने बैठा हूं।
आज फिर तुम्हें खत लिखने बैठा हूं।

…..by  Lahar

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
November 27, 2013

हाथ ही नहीं हिय भी कपता आज, कैसे पूरण होगा पतिया लेखन का काज

    Pankaj Kumar के द्वारा
    January 7, 2014

    हा हा हा बात तो सही है

yogi sarswat के द्वारा
November 27, 2013

हर पल को फिर से जीने बैठा हूं। तेरे यादों के काफिले को, फिर से रोकने बैठा हूं। आज फिर तुम्हें खत लिखने बैठा हूं। साथ बिताएं हर अदभुत पल को, फिर से दोहराने बैठा हूं। बड़े दिनों के बाद, आज फिर तुम्हें खत लिखने बैठा हूं। आज फिर तुम्हें खत लिखने बैठा हूं। स्वागत !

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 27, 2013

विचारणीय महत्वपूर्ण सुन्दर प्रस्तुति सादर

    Pankaj Kumar के द्वारा
    January 7, 2014

    धन्यवाद जी

sanjeev के द्वारा
November 24, 2013

सुन्दर रचना है 

    Pankaj Kumar के द्वारा
    November 26, 2013

    धन्यवाद


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